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Tukde Tukde hum nahin, tumhara tootna mumkin hai

टुकड़े टुकड़े हम नहीं, तुम्हारा टूटना मुमकिन है
– उमेश श्रिनिवसन

यह जो बैर के पहाड़ खड़े किए हैं तुमने
सोचा होगा के हैं हिमालय से भी बुलंद
हम नहीं जियेंगे इनके साए में
नफ़रत के टुकड़े कर देंगे

टुकड़े टुकड़े हम नहीं, तुम्हारा टूटना मुमकिन है

जाओ रेंगते उसी गुफाह में
जहाँ से साँप बनकर निकले हो
तुम्हारा ज़हेर ना होगा हमसे हज़म
आतंकवाद के टुकड़े कर देंगे

टुकड़े टुकड़े हम नहीं, तुम्हारा टूटना मुमकिन है

खून बहाया, मौत भी बाँटा
अब खामोशी में बर्दाश्त नहीं
ना होगा ख़त्म हमारे खून का कोष
भेदभाव के टुकड़े कर देंगे

यह टुकड़े टुकड़े हम नहीं, तुम्हारा टूटना मुमकिन है

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We’re not scared, not cowed…

Further to the lovely poetry and music that the recent protests across the country have been producing (see my recent post on Madara’s Tukde Tukde Kaun?), here’s two more that we ought to celebrate. The first one is (possibly) by Vishal Bharadwaj that he recited at the Carter Road protests at Bandra (Mumbai), that apparently also had several hundred Bollywood/TV personalities. And the second one further below is Sarfaroshi ki Tamanna by the poet Bismil Azimabadi, popularised in the Indian freedom struggle by another fellow Bismil, Ram Prasad Bismil. Both translations are by Umesh Srinivasan (email).

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